Dhammapada धम्मपद, Yamak Vaggo यमक वग्गो

मन ही प्रधान है (मट्ठकुण्डली की कथा)

श्रावस्ती में अदिन्न पूर्वक नामक एक महा कृपण ब्राह्मण को मट्ठकुण्डली नाम का इकलौता पुत्र था। सोलह वर्ष की आयु में मट्ठकुण्डली बीमार पड़ गया। अदिन्नपूर्वक ने धन बरबाद होने के डर से उसकी समुचित दावा न करायी। वह मरणासन्न व्यक्ति भगवान् को भिक्षाटन करते देख, उनपर मन को प्रसन्न करके मरकर तावतिंस नामक देवलोक में उत्पन्न हुआ। अदिन्नपूर्वक को जब यह ज्ञात हुआ, तो उसने भगवान को अपने घर भोजन के लिए निमंत्रित किया। भोजनोपरान्त उसने भगवान से पूछा – “हे गौतम! आपको बिना दान दिए, बिना पूजा किए, बिना धर्म सुने, केवल मन में प्रसन्न होने मात्र से लोग स्वर्ग में उत्पन्न होते हैं?”

भगवान ने कहा – “ब्राह्मण! न एक सौ, न दो सौ। मेरे ऊपर मन को प्रसन्न कर के स्वर्ग में उत्पन्न हुए व्यक्तियों की गणना नहीं है। मनुष्यों के पाप – पुण्य कर्मों को करने में मन अगुआ और प्रधान है। प्रसन्न मन से किया हुआ पुण्य कर्म देवलोक अथवा मनुष्य लोक में उत्पन्न होने वाले व्यक्तियों को, पीछे पीछे लगी रहने वाली छाया के समान नहीं छोड़ता है।” भगवान ने यह कहकर उपदेश देते हुए यह गाथा कही –

मनो पुब्बंगमा धम्मा मनो सेट्ठा मनोमया। मनसा चे पसन्नेन भासति वा करोति वा। ततो नं सुक्खमन्वेति छाया व अनपापिनी।।

मन सभी प्रवृत्तियों का अगुआ है, मन उसका प्रधान है, वे मन से ही उत्पन्न होती हैं। यदि कोई प्रसन्न मन से वचन बोलता है या काम करता है, तो सुख उसका अनुसरण उसी प्रकार करता है, जिस प्रकार कि कभी साथ नहीं छोड़ने वाली छाया।

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