Dhammapada धम्मपद, Yamak Vaggo यमक वग्गो

वैर के शांत होने के उपाय (थुल्लतिस्स स्थविर की कथा)

यह कथा भगवान बुद्ध की है। यह कथा वैर के शांत होने के उपाय के बारे में है, जो भगवान बुद्ध ने एक बार एक घटना के संदर्भ में कही थी।

भगवान के थुल्लतिस नामक एक चचेरे भाई थे। वह वृद्धावस्था में प्रव्रजित होकर श्रावस्ती के जेतवन महाविहार में रहते थे। वह अपने से बड़े भिक्षुओं का आदर सत्कार नहीं करते थे। एक दिन कुछ आगंतुक भिक्षुओं ने उन्हें डांटा, तब वह उठ कर रोते हुए भगवान के पास गए। वहां जाने पर भगवान ने सारी बातें पूछ कर उल्टे थुल्लतिस को ही उन भिक्षुओं से क्षमा मांगने को कहा। परंतु उन्होंने क्षमा नहीं मांगी। तब भगवान ने उनको उनके पूर्व जन्म में भी वैसा ही होने को कहकर उपदेश देते हुए इन गाथाओं को कहा:

अक्कोच्छि मं अवधि मं अजिनि मं अहासि मे। ये तं उपनह्यन्ति वेरं तेसं न सम्मति।। ३

उसने मुझे डांटा, उसने मुझे मारा, उसने मुझे जीत लिया, उसने मेरा सब कुछ लूट लिया, जो ऐसा मन में बनाए रखते हैं, उनका वैर शांत नहीं होता।

अक्कोच्छि मं अवधि मं अजिनि मं अहासि। ये तं न उपनह्यन्ति वेरं तेसूपसम्मति।। ४

उसने मुझे डांटा, उसने मुझे मारा, उसने मुझे जीत लिया, उसने मेरा सब कुछ लूट लिया, जो ऐसा मन में बनाए नहीं रखते हैं, उनका वैर शांत हो जाता है।

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